जीवन- अर्थ नहीं, एक लीला....
अच्छा–बुरा, जीवन–मरण — ये प्रश्न जितने सीधे दिखते हैं, उतने सरल नहीं हैं। हम जब भी ऐसे प्रश्न उठाते हैं, तो अनजाने में कुछ धारणाएँ साथ लेकर चलते हैं। सबसे पहली धारणा यह होती है कि हर चीज़ का कोई न कोई अर्थ, कोई उद्देश्य अवश्य होना चाहिए।
एक फूल खिले तो हम पूछते हैं — क्यों खिला?
सूरज उगे तो पूछते हैं — किसलिए?
पर न फूल उत्तर देता है, न सूरज। फूल बस खिलता है, सूरज बस चमकता है। और हम अर्थ खोजते-खोजते उलझते रहते हैं।
असल में हमारी उलझन यहीं से शुरू होती है। हमने मान लिया है कि अस्तित्व की हर घटना का कोई निश्चित प्रयोजन होना चाहिए। लेकिन यदि सचमुच हर चीज़ केवल प्रयोजन के लिए ही हो, तो जीवन बोझिल और यांत्रिक हो जाए। जो कुछ भी जीवन में सुंदर है — प्रेम, संगीत, नृत्य, हँसी, खेल — वह अपने आप में पूर्ण है, किसी बाहरी अर्थ पर निर्भर नहीं।
जब कोई प्रेम करता है और पूछता है, “इसका मतलब क्या है?”, तो प्रेम सूखने लगता है।
जब कोई नाचते हुए पूछे, “नाचने से क्या मिलेगा?”, तो नृत्य मर जाता है।
पक्षी सुबह गाते हैं — वे लाभ नहीं गिनते; गाना ही उनका आनंद है।
समस्या यह है कि हम जीवन को काम की दृष्टि से देखते हैं, खेल की दृष्टि से नहीं। काम में परिणाम प्रधान होता है; खेल में अनुभव। काम में लक्ष्य है; खेल में लय। और विडंबना यह है कि हम काम से थके हुए हैं, फिर भी उसी को जीवन का आधार बनाए रखते हैं। खेल को भी काम बना देना चाहते हैं।
बच्चे खेलते हैं तो खेल ही उनका उद्देश्य है। बड़े पूछते हैं — “क्या फायदा?” क्योंकि उन्हें खेल की सहजता खो चुकी है। वे मंदिर भी तभी जाएंगे जब वहां कुछ लाभ दिखाई दे। वे भगवान को भी सौदे की भाषा में समझना चाहते हैं।
लेकिन यदि हम हर चीज़ से अर्थ माँगते-माँगते अंत तक चले जाएँ, तो एक दिन यह प्रश्न उठेगा — “मेरे होने का क्या अर्थ है?” और यदि अर्थ ही सब कुछ है, तो इस प्रश्न का उत्तर न मिलने पर जीवन असहनीय हो सकता है।
शायद समझ का द्वार तब खुलता है जब हम स्वीकार करते हैं कि जीवन केवल प्रयोजन नहीं, एक लीला भी है। जब हम उसे खेल की तरह जीना सीखते हैं — बिना हर क्षण का हिसाब माँगे।
तब प्रश्न मिटते नहीं, लेकिन उनका बोझ हल्का हो जाता है। जीवन तब अर्थ खोजने की दौड़ नहीं रहता; वह स्वयं एक अनुभव बन जाता है — पूर्ण, स्वतंत्र और पर्याप्त।🙏

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