कुचवाड़ा से चेतना तक- ओशो जन्मस्थली यात्रा, 25.01.2026
जन्मस्थली- ग्राम कुचवाड़ा, रायसेन ( मध्यप्रदेश)
ओशो जन्मस्थली जाना, मेरे लिए केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि एक गहरी आंतरिक तीर्थयात्रा है। यह उस स्रोत से जुड़ना है जहाँ से वह चेतना प्रवाहित हुई, जिसने मेरे जीवन को जागृत किया। जन्मस्थली पहुँचना ऐसा अनुभव है जैसे अपने भीतर के मौन से साक्षात्कार करना, जहाँ शब्द नहीं, अनुभूति बोलती है।
ओशोप्रेमी के लिए जन्मस्थली का महत्व इसलिए भी गहरा है क्योंकि वह स्थान याद दिलाता है कि कोई भी साधारण गाँव, कोई भी साधारण जीवन, असाधारण चेतना का उद्गम बन सकता है। यह भरोसा जगाता है कि परिवर्तन बाहर नहीं, भीतर घटता है, स्थान केवल स्मरण कराते हैं, यात्रा आत्मा की होती है।
मेरे जीवन में श्री ओशो की पुस्तक “गहरे पानी पैठ” ने ठीक यही परिवर्तन की दिशा दिखाई। यह पुस्तक केवल पढ़ने का अनुभव नहीं रही, बल्कि डूबने का अनुभव बनी। उसने मुझे सतह पर जीने से हटाकर गहराई में उतरना सिखाया, जहाँ भय, आकांक्षा, अहंकार और असत्य धीरे-धीरे गलते हैं और शुद्ध साक्षीभाव जन्म लेता है। इस पुस्तक ने यह बोध कराया कि जीवन को समझना नहीं, जीना है और जीने का अर्थ है- पूरी तरह, सजगता के साथ, प्रेम में।
इन दोनों अनुभवों जन्मस्थली की यात्रा और “गहरे पानी पैठ” के अध्ययन ने मेरे भीतर एक ही सत्य को पुष्ट किया कि जीवन परिवर्तन कोई बाहरी क्रांति नहीं, बल्कि आंतरिक मौन में घटने वाली शांत क्रांति है। साथ ही जाना कि सत्य को पाया नहीं जाता, उसमें उतरा जाता है और कि प्रेम, ध्यान और सजगता यही जीवन के सच्चे मार्गदर्शक हैं।
आज मेरा जीवन पहले जैसा नहीं रहा। सोचने का ढंग बदला, देखने की दृष्टि बदली, और सबसे महत्वपूर्ण जीने की शैली बदली। अब जीवन एक संघर्ष नहीं, एक उत्सव लगता है, एक बोझ नहीं, एक आशीर्वाद प्रतीत होता है।
श्री ओशो के शब्दों में कहूँ तो....
"तुम बदलते नहीं हो, बल्कि जागते हो और जागरण ही सच्चा परिवर्तन है।"
🙏




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