गुरु.....कौन है ?

                        

                               गुरु...... कौन हैं ?

                                


            "आज गुरु पूर्णिमा है। गुरु व प्रभु को सादर प्रणाम"🙏

                गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णुः गुरूर्देवो महेश्वरः ।

              गुरूर्साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ।।

          उक्त श्लोक “स्कन्द पुराण” के गुरुगीता के गुरुस्त्रोतम से लिया गया है। गुरुगीता नामक यह पूरा अध्याय गुरु को समर्पित है। गुरु की महिमा अपरंपार है। हम कोई भी शास्त्र, वेद, पुराण, उपनिषद उठा लें, सभी में गुरु की महिमा को बताया गया है। अगर जीवन में सिर पर गुरु का हाथ है तो फिर कुछ भी कर पाना संभव है। इस श्लोक में गुरु के महत्व को बतलाया गया है। गुरु को परमात्मा तुल्य बताया गया है।

            शास्त्र को आधार मानते हुए हम गुरु को परमात्मा तुल्य मानते हैं। बात श्रेष्ठ है, साथ ही एक समस्या है कि हम गुरु किसे माने या गुरु को पहचाने कैसे ?

            इस प्रश्न का उत्तर कबीर जी ने सूक्ष्मवेद में कबीर सागर के अध्याय ‘‘जीव धर्म बोध‘‘ में पृष्ठ 1960 पर दिया है :-

गुरू के लक्षण चार बखाना, प्रथम वेद शास्त्र को ज्ञाना।।

दुजे हरि भक्ति मन कर्म बानि, तीजे समदृष्टि करि जानी।।

चौथे वेद विधि सब कर्मा, ये चार गुरू गुण जानों मर्मा।।

अर्थात् कबीर जी ने कहा है कि जो सच्चा गुरू होगा, उसके चार मुख्य लक्षण होते हैं :-

सब वेद तथा शास्त्रों को वह ठीक से जानता है।

दूसरे वह स्वयं भी भक्ति मन-कर्म-वचन से करता है अर्थात् उसकी कथनी और करनी में कोई अन्तर नहीं होता।

तीसरा लक्षण यह है कि वह सर्व अनुयाईयों से समान व्यवहार करता है, भेदभाव नहीं रखता।

चौथा लक्षण यह है कि वह सर्व भक्ति कर्म वेदों के अनुसार करवाता है तथा अपने द्वारा करवाए भक्ति कर्मों को वेदों से प्रमाणित भी करता है।


               गुरु – ‘गु’ – अंधकार या अज्ञानता, ‘रू’ – दूर करने वाला। गुरु का अर्थ – अंधेरा या अज्ञानता दूर करने वाला।


                ऊपर वर्णित बातों को प्रधानता देते हुए जीवन में जो भी व्यक्ति हमारे अंधकार या अज्ञानता को दूर करते हुए हमारे जीवन को श्रेष्ठ बनाने हेतु सहायता एवं मार्गदर्शन दे, वे सभी गुरु हैं।

              इसके साथ ही हम स्वयं भी अपने गुरु हैं क्योंकि हर निर्णय को निश्चित व क्रियान्वित करने में हम ही अंतिम होते हैं। हम ही निर्णय को ना मानने के बहाने ढूंढते हैं। गुरु द्वारा श्रेष्ठ कार्य बताया गया अपितु उसको करना या ना करना या कब करना या किसके साथ करना या किसके साथ नहीं करना आदि कई बातों पर अंतिम निर्णय हम स्वंय ही लेते हैं। ये निर्णय किसके मार्गदर्शन में अंतिम रूप लेते हैं? 

       शायद इस प्रश्न का जबाब हैं हमारी "आत्मा"। 


      अंतिम बात

             "बहुत आसान होता है किसी पर ऊंगली उठाना, लेकिन बहुत मुश्किल होता है, किसी को उठाने के लिये उसकी ऊंगली को पकड़ना।"

              एक बार पुनः गुरु शिष्य परंपरा के महान पर्व गुरुपूर्णिमा की सभी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।।      

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  गुरु से सम्बन्धित पिछली पोस्ट-  

https://jeevanekavsar.blogspot.com/2020/05/gurukibaatjanmdinkesath.html      


  गुरु से सम्बन्धित यूट्यूब वीडियो-

      https://youtu.be/qQR6SPfugOM 


        

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