साथियों पुराने अखबार 30 अक्टूबर 2019 को दैनिक भास्कर के मधुरिमा संस्करण में एक लेख पढ़ने को मिला, वह लेख आप सभी के समक्ष वैसे ही शब्दों में प्रस्तुत है। काफी छोटी सी घटना है, जिससे बड़ी प्यारी सी सीख हम सभी प्राप्त कर सकते हैं। यह सत्य घटना है जिसे प्रकाशित किया गया। शोभा रानी गोयल जी ने अपनी एक घटना का वर्णन किया शीर्षक है-
"मदद का जज्बा इसे कहते हैं"
मैं ऑफिस बस से ही आती जाती हूं। यह मेरी दिनचर्या का हिस्सा है। उस दिन भी बस काफी देर से आएगी लगभग आधे पौन घंटे बाद, खड़े-खड़े पैर दुखने लगे थे। पर चलो शुक्र था कि बस मिल गई। देर से आने के कारण पहले से ही बस काफी भरी हुई थी। बस में चढ़कर मैंने चारों तरफ नजर दौड़ाई, तो पाया की सभी सीटें भर चुकी थी। उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आई, तभी एक मजदूरन ने मुझे आवाज लगाकर अपनी सीट देते हुए कहा। मैडम आप यहां बैठ जाइए। मैंने उसे धन्यवाद देते हुए, उस सीट पर बैठकर राहत की सांस ली। वह महिला मेरे साथ बस स्टॉप पर खड़ी थी, तब मैंने उस पर ध्यान नहीं दिया था। कुछ देर बाद मेरे पास वाली सीट खाली हुई, तो मैंने उसे बैठने का इशारा किया। तब उसने एक महिला को उस सीट पर बैठा दिया, जिसकी गोद में एक छोटा बच्चा था।
वो मजदूरन भीड़ की धक्का-मुक्की सहते हुए एक पोल को पकड़कर खड़ी थी। थोड़ी देर बाद बच्चे वाली औरत अपने गंतव्य पर उतर गई। इस बार वह सीट एक बुजुर्ग को दे दी, जो लंबे समय से बस में खड़े हुए थे। मुझे आश्चर्य हुआ कि हम दिन रात बस की सीट के लिए लड़ते हैं, वह सीट मिलती है और दूसरों को दे देती है। कुछ देर बाद वह बुजुर्ग भी अपने स्टाफ पर उतर गए, तब वह सीट पर बैठी। मुझसे रहा नहीं गया, तो उससे पूछ बैठी तुम्हें तो सीट मिल गई थी। एक या दो बार नहीं बल्कि 3 बार, फिर भी तुमने सीट क्यों छोड़ी? तुम दिन भर ईट गारा ढोती हो, आराम की जरूरत तो तुम्हें भी होगी। फिर क्यों नहीं बैठी?
मेरी इस बात का जो जवाब उसने दिया उसकी उम्मीद मैंने कभी नहीं की थी। उसने कहा मैं भी थकती हूं, आपसे पहले से स्टॉप पर खड़ी थी। मेरी भी पैरों में दर्द होने लगा था। जब मैं बस में चढ़ी थी, तब यही सीट खाली थी। मैंने देखा आपके पैरों में तकलीफ होने के कारण आप धीरे-धीरे बस में चढी। ऐसे में आप कैसे खड़ी रहती, इसलिए मैंने आपको सीट दे दी। उस बच्चे वाली महिला को सीट इसलिए दी उसकी गोद में छोटा बच्चा था जो बहुत देर से रो रहा था। उसने सीट पर बैठते ही सुकून महसूस किया। बुजुर्ग के खड़े रहते मैं कैसे बैठती, सो उन्हें दे दी। मैंने उन्हें सीट देकर ढेरों आशीर्वाद पाए। कुछ देर का सफर है मैडम जी, सीट के लिए क्या लड़ना। वैसे भी सीट को बस में ही छोड़कर जाना है, घर तो नहीं ले जाना ना। मैं ठहरी ईटगारा ढोने वाली, मेरे पास क्या है, ना दान करने लायक धन है, कोई पुण्य कमाने लायक करने के लिए। रास्ते से कचरा हटा देती हूं, रास्ते के पत्थर बटोर देती हूं, कभी कोई पौधा लगा देती हूँ।
यहां बस में अपनी सीट दे देती हूं।यही है मेरे पास, यही करना मुझे आता है। वो तो मुस्कुरा कर चली गई पर मुझे आत्म मंथन करने को मजबूर कर गई। मुझे उसकी बातों से एक सीख मिली कि हम बड़ा कुछ नहीं कर सकते तो समाज में एक छोटा सा, नगण्य दिखने वाला कार्य तो कर ही सकते हैं। मुझे लगा यह मजदूर महिला उन लोगों के लिए सबक है जो अपना रुतबा दिखाने, अपनी प्रतिष्ठा का प्रदर्शन करने और आयकर बचाने के लिए अपनी काली कमाई को दान के नाम पर खपाते हैं या फिर वो लोग जिनके पास पर्याप्त पैसा होते हुए भी गरीबी का रोना रोते हैं। हम समाज सेवा के नाम पर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं परंतु इन छोटी-छोटी बातों पर कभी ध्यान नहीं देते। मैंने मन ही मन उस महिला को नमन किया तथा उससे सीख ली यदि हमें समाज के लिए कुछ करना हो तो वह दिखावे के लिए ना किया जाए बल्कि खुद की संतुष्टि के लिए हो।
साथियों हार्दिक आभार🙏
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