कोरोना के साथ, जीना





                                            ईश्वर को प्रणाम आप सभी साथियों को नमस्कार🙏

             दिनांक 25 मई 2020 को ईद का त्यौहार था, आप सभी को ईद की हार्दिक शुभकामनाएं🙏

             25 मई 2020 को ही "जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि" के नाम से एक वीडियो, जीवन एक अवसर संस्था के यूट्यूब चैनल पर अपलोड किया। उसको बनाते समय निम्नलिखित पंक्तियां Net पर पढी थी, वो पंक्तियां निम्नलिखित है-

                        "मिलकर होती थी कभी ईद भी दिवाली भी,

                                   अब यह हालात है कि डर डर के गले मिलते हैं।।"


             आज के वर्तमान समय में शायरी की दूसरी पंक्ति में कोरोना को देखते हुए जो परिवर्तन समयनुसार अनुभव हो रहा है, उस अनुभव को व्यक्त करने के लिए सटीक व सरल पंक्ति निम्न लिखित हैं-

                                         "अब ये हालात हो गए हैं की गले मिलते ही नहीं।।"


               आज के वर्तमान समय में गले मिलना तो दूर हाथ मिलाना भी अहितकारी व घातक सिद्ध हो रहा है। आज के समय को देखते हुए हमें कोरोना के साथ लड़ाई ना करते हुए, कोरोना के साथ जीवन जीने की कला को सीखना पड़ेगा और जीवन की कल्पना को स्वीकार करना पड़ेगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी कह दिया कि अब प्रत्येक व्यक्ति को कोरोना के साथ जीना सीखना होगा। क्योंकि पिछले 2 माह तक बाजार, व्यवसाय, यातायात बंद रहने के साथ-साथ हम सभी अपने घरों पर रहते हुए शासन के द्वारा समय-समय पर प्राप्त निर्देशों के आधार पर कोरोना से बचाव हेतु सजग व सावधान रहे हैं।

            इसके अतिरिक्त इस बीमारी से मुक्ति पाने के लिए हम हाथ को बार-बार सैनिटाइज करें और जब हम घर पर रह रहे हो तो साबुन से हाथ बार बार साफ करें।  मास्क लगाकर रखें, साथ ही ग्लब्स भी पहनकर ही घर से बाहर निकले। इसके अलावा कई तरह के उपकरण सामग्री बाजार में उपलब्ध है जिनका उपयोग करते हुए हम अपना पूर्ण रखरखाव व सुरक्षा कर सकते हैं। कई प्रकार के उपाय हैं जैसे इम्युनिटी पावर बढ़ाने हेतु हेल्थ टॉनिक लें जिससे कि हमारा शरीर इस रोग से लड़ने हेतु तैयार रहें। इसके अतिरिक्त और भी जो उपाय हमें पता हो जिनसे हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ सकती है, उसका प्रयोग हम सभी करें। इस समय में हमें अपनी यूनिटी पावर को बढ़ाते हुए सावधानी से जीवन को स्वीकार करना होगा।

           स्वीकार करने के भाव से विरोधाभास खत्म हो जाता है और इन निम्नलिखित पंक्तियों के साथ आज की बात को यहीं विराम देता हूं-

           "जीवन में 2 मूल विकल्प होते हैं स्थितियों को उसी रूप में स्वीकार करना जैसी वे  हैं या उन्हें बदलने का उत्तरदायित्व स्वीकार करना।"


                      आप सभी को एक बार पुनः धन्यवाद व ईश्वर को कोटि-कोटि प्रणाम 🙏



पिछली पोस्ट पर जाने हेतु लिंक-
https://jeevanekavsar.blogspot.com/2020/05/jaisidrashtivaisisrashti.html?m=1


"जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि" की वीडियो लिंक-
https://youtu.be/9Moqkf2v_l0

चित्र आभार twitter
शायरी आभार rekhta.org















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