" जीवन निहारों अपनी नजर से"
ईश्वर को प्रणाम व सभी साथियों को नमस्कार 🙏🏻
आज आप सभी को मजदूर दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏🏻
" श्रम करने वाला हर व्यक्ति मजदूर होता है।"
मैं कहता हूं कि मैं मजदूर हूँ। इस वर्ग विशेष का महत्व निम्न पंक्तियों में जितने सुंदर तरीके से बताया गया है, उतने सटीक शब्द मेरे लेखन में नहीं है। पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं-
"अगर इस जहां में मजदूर का नामोनिशां ना होता,
फिर ना होता हवामहल और नहीं ताजमहल होता।।"
बड़ी सुंदर पंक्तियां हैं, जिनकी लेखनी से प्रथम बार लिखी गई, उन लेखक को नमन व आभार🙏🏻
बात कुछ इस तरह है कि आज हमारे आसपास कोरोना वायरस, lockdown से सिर्फ हम ही नहीं बल्कि पूरा विश्व जूझ रहा है। परेशानी तो है, मगर समय सब ठीक करता है। यह विश्वास व आशा है। ये जो आशा, विश्वास, नजरिया, स्नेह, अनुभव आदि बहुत से भाव हैं। इनमें कोई बड़ा विशेष अंतर नहीं होता, बाल से भी बारीक अंतर सोचने में समझ आता है। हमें कई बार पता ही नहीं चलता कि हम विश्वास से कह रहे हैं, कि आत्मविश्वास से कह रहे हैं, कि अति विश्वास से कह रहे हैं।
मेरे अनुभव व विचार से इन सभी में बड़ा बारीक अंतर होता हैं। आज का जो शीर्षक है 'जीवन निहारों अपनी नजर से" इसमें भी जिस बात का जिक्र मैं करने जा रहा हूँ कि नजर से सब बदल सकता हैं। कुछ पंक्तियां मैंने पढ़ी थी-
"नजर को बदलो तो नजारे बदल जाते हैं,
सोच को बदलो तो सितारे बदल जाते हैं।
कश्तियां बदलने की जरूरत नहीं,
दिशा को बदलो किनारे खुद ब खुद बदल जाते हैं।।"
शीर्षक के अनुसार जो कहानी हैं, उसमें नजरिए के द्वारा कार्य के महत्व को जो देखने का तरीका है। उस तरह से हम अगर देखना प्रारंभ कर पाए तो हमारा जीवन भी आनंदित हो सकता हैं।कहानी कुछ इस प्रकार से हैं-
एक समय की बात है। एक राज्य में वहाँ के राजा द्वारा मन्दिर का निर्माण करवाया जा रहा था।
वहाँ पर तीन मजदूर पत्थर तोड़ने का काम कर रहे थे। तभी वहाँ एक घुड़सवार आता है। और
मजदूरों को देखकर रुक जाता है।
वह सबसे पहले मजदूर के पास जाता है ,और पूछता है " भाई ये क्या कर रहे हो "
तो वह मजदूर गुस्से से घुड़सवार की ओर देखकर कहता है " देख नहीं रहे हो ,अपनी किस्मत
फोड़ रहा हूँ। माँ -बाप ने पढ़ाया लिखाया नहीं ,इसलिये आज यहाँ पत्थर तोड़ रहा हूँ। "
इतना कहकर वह जोर -जोर से पत्थर तोड़ने लगता है।
वह व्यक्ति दुसरे मजदूर के पास जाता है। और पूछता है "भाई ये क्या कर रहे हो "
वह मजदूर अपना काम रोककर कहता है " भाई मैं यहीं पास के गाँव में रहता हूँ , अपने परिवार
को चलाने के लिए मजदूरी करता हूँ। यहाँ से जो पैसा मिलता है ,उससे मेरा घर - परिवार चल
जाता है। "
अंत में वह घुड़सवार तीसरे मजदूर के पास जाता है। जो बहुत ख़ुश होकर , गुनगुनाते हुए हथौड़े
पत्थर तोड़ रहा था। और अपने काम में बहुत मगन था। वह उससे भी वही सवाल पूछता है ,
" भाई ये क्या कर रहे हो "
तो वह मजदूर उस व्यक्ति की ओर देखकर मुस्कुराते हुए कहता है " भाई मैं एक बहुत बड़ा काम
कर रहा हूँ। क्या तुम्हें पता है ,जिन पत्थर को मैं तोड़ रहा हूँ उन पर नक्काशी की जाएगी। और
उन्हें इस विशाल मन्दिर में लगाया जाएगा। हजारो लोग यहाँ पर ईश्वर की प्रार्थना करने आयेगे।
यह सौभाग्य है ,कि मुझे यहाँ पर काम मिल गया। मुझे इस बात पर गर्व है।
यह मन्दिर सदियों तक यहाँ रहेगा , मैं बड़े होने पर अपने बच्चों को जब बताऊँगा की इस मन्दिर
के निर्माण में मेरा भी छोटा सा योगदान है। तो वह कितना ख़ुश होंगे। "
इतना कहकर वह मजदूर गुनगुनाते हुए , फिर पत्थर तोड़ने लगता है।
तीनों की बातें सुनकर घुड़सवार वहाँ से चल देता है। और सोचने लगता है की तीनों एक ही काम
कर रहे है। पर तीनों की सोच कितनी अलग है।
साथियों देखा आपने कि काम वही हैं एक मजदूर दुखी हैं, दूसरा मजदूर सन्तुष्ट हैं जबकि तीसरा मजदूर अति आनंदित व सौभाग्यशाली महसूस कर रहा हैं। अपने कार्य के प्रति जो नजरिया था, जो एक ही कार्य को करके अलग-अलग महसूस कर रहे थे। वह शायद कहीं ना कहीं नजर का फर्क था।
दोस्तों हजारों लोग हैं, जो मन मारकर ,जिन्दगी को बोझ समझकर अपना जीवन गुजार देते है। अपनी जिम्मेदारी को बोझ समझते हैं। और यही गुण हमारे बच्चों में भी आ जाते हैं। और उनका जीवन भी हमारी तरह नीरस हो जाता है। हम जीवन को किसी सज़ा की तरह काटते हैं। या वास्तव में अपने जीवन का आनंद लेना चाहते हैं। इस पृथ्वी पर जन्म लेने वाले हर मनुष्य को अपने जीवन- यापन के लिए ,कुछ ना कुछ काम काम तो करना ही पड़ता है। अब यह हमारे ऊपर निर्भर करता है ,कि हम उस काम को खुश होकर करते हैं या दुखी होकर।
आशा है कि हम सभी कहीं ना कहीं अवश्य सकारात्मक बदलाव कर, आनंदित होगें। मैं शिक्षा विभाग से जुड़ा हूं और हर कोई कुछ ना कुछ कार्य कर ही रहा हैं।अंत में कुछ पंक्तियां आपके समक्ष प्रस्तुत हैं। इन पंक्तियों को पढ़कर हम अपने आस पास क्या सहायता कर सकते हैं। इन पंक्तियों को विचार करके ही कार्य करें। ऐसी विनय हैं🙏🏻
" मजदूरों की होती हैं,बस एक इच्छा
अपने परिवार की खुशी और अपने बच्चों की शिक्षा।।"
आप सभी साथियों को धन्यवाद, ईश्वर को कोटि-कोटि प्रणाम🙏🏻
पिछली पोस्ट पर जाने हेतु लिंक- https://jeevanekavsar.blogspot.com/2020/04/blog-post_30.html?m=1
एक समय की बात है। एक राज्य में वहाँ के राजा द्वारा मन्दिर का निर्माण करवाया जा रहा था।
वहाँ पर तीन मजदूर पत्थर तोड़ने का काम कर रहे थे। तभी वहाँ एक घुड़सवार आता है। और
मजदूरों को देखकर रुक जाता है।
वह सबसे पहले मजदूर के पास जाता है ,और पूछता है " भाई ये क्या कर रहे हो "
तो वह मजदूर गुस्से से घुड़सवार की ओर देखकर कहता है " देख नहीं रहे हो ,अपनी किस्मत
फोड़ रहा हूँ। माँ -बाप ने पढ़ाया लिखाया नहीं ,इसलिये आज यहाँ पत्थर तोड़ रहा हूँ। "
इतना कहकर वह जोर -जोर से पत्थर तोड़ने लगता है।
वह व्यक्ति दुसरे मजदूर के पास जाता है। और पूछता है "भाई ये क्या कर रहे हो "
वह मजदूर अपना काम रोककर कहता है " भाई मैं यहीं पास के गाँव में रहता हूँ , अपने परिवार
को चलाने के लिए मजदूरी करता हूँ। यहाँ से जो पैसा मिलता है ,उससे मेरा घर - परिवार चल
जाता है। "
अंत में वह घुड़सवार तीसरे मजदूर के पास जाता है। जो बहुत ख़ुश होकर , गुनगुनाते हुए हथौड़े
पत्थर तोड़ रहा था। और अपने काम में बहुत मगन था। वह उससे भी वही सवाल पूछता है ,
" भाई ये क्या कर रहे हो "
तो वह मजदूर उस व्यक्ति की ओर देखकर मुस्कुराते हुए कहता है " भाई मैं एक बहुत बड़ा काम
कर रहा हूँ। क्या तुम्हें पता है ,जिन पत्थर को मैं तोड़ रहा हूँ उन पर नक्काशी की जाएगी। और
उन्हें इस विशाल मन्दिर में लगाया जाएगा। हजारो लोग यहाँ पर ईश्वर की प्रार्थना करने आयेगे।
यह सौभाग्य है ,कि मुझे यहाँ पर काम मिल गया। मुझे इस बात पर गर्व है।
यह मन्दिर सदियों तक यहाँ रहेगा , मैं बड़े होने पर अपने बच्चों को जब बताऊँगा की इस मन्दिर
के निर्माण में मेरा भी छोटा सा योगदान है। तो वह कितना ख़ुश होंगे। "
इतना कहकर वह मजदूर गुनगुनाते हुए , फिर पत्थर तोड़ने लगता है।
तीनों की बातें सुनकर घुड़सवार वहाँ से चल देता है। और सोचने लगता है की तीनों एक ही काम
कर रहे है। पर तीनों की सोच कितनी अलग है।
साथियों देखा आपने कि काम वही हैं एक मजदूर दुखी हैं, दूसरा मजदूर सन्तुष्ट हैं जबकि तीसरा मजदूर अति आनंदित व सौभाग्यशाली महसूस कर रहा हैं। अपने कार्य के प्रति जो नजरिया था, जो एक ही कार्य को करके अलग-अलग महसूस कर रहे थे। वह शायद कहीं ना कहीं नजर का फर्क था।
दोस्तों हजारों लोग हैं, जो मन मारकर ,जिन्दगी को बोझ समझकर अपना जीवन गुजार देते है। अपनी जिम्मेदारी को बोझ समझते हैं। और यही गुण हमारे बच्चों में भी आ जाते हैं। और उनका जीवन भी हमारी तरह नीरस हो जाता है। हम जीवन को किसी सज़ा की तरह काटते हैं। या वास्तव में अपने जीवन का आनंद लेना चाहते हैं। इस पृथ्वी पर जन्म लेने वाले हर मनुष्य को अपने जीवन- यापन के लिए ,कुछ ना कुछ काम काम तो करना ही पड़ता है। अब यह हमारे ऊपर निर्भर करता है ,कि हम उस काम को खुश होकर करते हैं या दुखी होकर।
आशा है कि हम सभी कहीं ना कहीं अवश्य सकारात्मक बदलाव कर, आनंदित होगें। मैं शिक्षा विभाग से जुड़ा हूं और हर कोई कुछ ना कुछ कार्य कर ही रहा हैं।अंत में कुछ पंक्तियां आपके समक्ष प्रस्तुत हैं। इन पंक्तियों को पढ़कर हम अपने आस पास क्या सहायता कर सकते हैं। इन पंक्तियों को विचार करके ही कार्य करें। ऐसी विनय हैं🙏🏻
" मजदूरों की होती हैं,बस एक इच्छा
अपने परिवार की खुशी और अपने बच्चों की शिक्षा।।"
आप सभी साथियों को धन्यवाद, ईश्वर को कोटि-कोटि प्रणाम🙏🏻
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