"मन की बात"
ईश्वर को प्रणाम व आप सभी साथियों को नमस्कार 🙏🏻 आप सभी का समय, स्नेह, सहयोग व सुझाव मिल रहे है, आप सभी को बहुत बहुत धन्यवाद। आशा करता हूँ व साथ ही परमेश्वर से प्रार्थना है कि इसी तरह आप सभी समय, प्रेम,सहयोग व सुझाव देते रहेगें, जिससे कि इस कार्य को जारी रखने हेतु मुझे ऊर्जा मिलती रहे। मैं लेखन के क्षेत्र में जन्में बालक की तरह हूँ, जैसे कोई छोटा बालक जब चलना प्रारंभ करता है तो उसके परिवार के सदस्य ताली बजाकर एक-एक कदम बढ़ाने हेतु उत्साहित करते है, ठीक वैसे ही मेरा चलना प्रारंभ हैं। आप सभी से विनय हैं कि आप मुझे चलना सिखाएं। आप सभी को कोटि कोटि धन्यवाद। आज दिनांक 26.04.2020 तिथि अक्षय तृतीया पर कुछ जानकारी साझा करने का विचार हैं, पिछली post में आगामी शुभकामनाएं परशुराम प्राकट्योत्सव की समाहित की गई थी, आज एक बार पुनः आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।
बात कुछ इस प्रकार है कि हमारे विश्व में लगभग 300 धर्म या उससे ज्यादा होगे, लेकिन व्यापक रूप में 6 धर्म प्रचलित हैं- हिंदू, जैन, सिख, इस्लाम, ईसाई व बौद्ध। इसके साथ दुनिया में कुल 12 धर्म हैं, जो अपना कुछ अलग स्थान बनाये हुए हैं, जो कि निम्नलिखित हैं- 1.हिंदू या सनातन धर्म।
3.बौद्ध धर्म
4.इस्लाम धर्म
5.सिख धर्म
6.ईसाई धर्म
7.यहूदी धर्म
8.पेगन धर्म
9.वूडू धर्म
10.पारसी धर्म
11.जेन धर्म
12.शिंतो धर्म
मेरा अल्पज्ञान है, इसमें कुछ संशोधन हो तो मान्य है। उक्त 12 धर्मों के अतिरिक्त और भी धर्म हैं मगर जब हम शिक्षक से बात करते है कि शिक्षक का क्या धर्म है, चिकित्सक से बात करें तो चिकित्सक का क्या धर्म हैं आदि।
इस तरह जीविका आधारित या पद के आधार पर भी धर्म हैं। जैसे में सनातन धर्म में जन्मा, साथ ही वर्तमान में शिक्षक हूँ तो सनातन धर्म के साथ मुझे शिक्षक धर्म का भी पालन करना होगा। धर्म भारतीय संस्कृति की प्रमुख संकल्पना हैं। धर्म शब्द का पश्चिमी भाषाओं में किसी समतुल्य शब्द का पाना बहुत कठिन है। साधारण शब्दों में धर्म के बहुत से अर्थ है जिनमें से कुछ ये भी है कर्तव्य, न्याय, अहिंसा, सदाचरण, सद्गुण आदि।। धर्म का शाब्दिक अर्थ होता है "धारण करने योग्य" सबसे उचित धारणा अर्थात जिसे सबको धारण करना चाहिए। हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, जैन, सिख या बौद्ध आदि धर्म न होकर सम्प्रदाय या समुदाय हैं। "सम्प्रदाय" एक परम्परा के मानने वालों का समूह हैं। ऐसा माना जाता है कि धर्म मानव को मानव बनाता है।
दरअसल, धर्म मूल स्वभाव की खोज है। धर्म एक रहस्य है, संवेदना है, संवाद है और आत्मा की खोज है। धर्म स्वयं की खोज का नाम है। जब भी हम धर्म कहते हैं तो यह ध्वनीत होता है कि कुछ है जिसे जानना जरूरी है। कोई शक्ति है या कोई रहस्य है। धर्म है अनंत और अज्ञात में छलांग लगाना। धर्म है जन्म, मृत्यु और जीवन को जानना।
हिन्दू संप्रदाय में धर्म को जीवन को धारण करने, समझने और परिष्कृत करने की विधि बताया गया है। धर्म को परिभाषित करना उतना ही कठिन है जितना ईश्वर को। दुनिया के तमाम विचारकों ने जिन्होंने धर्म पर विचार किया है, अलग-अलग परिभाषाएं दी हैं।
इसके साथ और सरल परिभाषा यह है कि " धर्म वहीं हैं, जो आपके जीवन स्तर को सर्वश्रेष्ठ करें।"
यह बात मैंने पंडित श्री विजयशंकर मेहता जी के प्रवचन में या उनकी किसी पुस्तक में पढ़ा था। अगर भविष्य में वो पृष्ठ video प्राप्त होगा तो मैं आने वाली post में साझा जरूर करूंगा।
गुरु श्री मेहता जी का लेख दैनिक भास्कर में नित्य "जीने की राह"आता है। आप सभी इनसे परिचित होंगे। इनका चित्र post में attach कर रहा हूँ। "जीवन प्रबंधन गुरु" के नाम से आपकी ख्याति पूरे विश्व में हैं। मैंने जीवन के कुछ कठिन समय में आपके प्रवचन सुनकर व आपकी पुस्तकें पढ़कर बहुत सकारात्मक परिवर्तन महसूस किया। जैसे कि आप प्रभु श्री हनुमान जी महाराज की कृपा पर बात करते है। आप कहते हैं कि विश्वास होना चाहिए कि जैसे दूसरों को प्रभु मिले हैं तो मुझे भी मिलेंगे। ऐसा कुछ मेरे जीवन में वर्ष 2012 में घटा और प्रभु श्री टेकरी वाले हनुमानजी, श्री सोजनी वाले हनुमानजी व पछीत वाले दादा और हमारे सागर, मध्यप्रदेश में विराजमान श्री परेड़ वाले हनुमानजी की कृपा से मेरा ये एक तरह से दूसरा जन्म है। कभी विस्तार से अपनी वर्ष 2012 वाली शारीरिक व्याधि पर चर्चा करूंगा कि किस तरह प्रभु की कृपा हुई। ये जो बात मैंने अपनी रखी, व्यक्तिगत रूप से जो सीधे मेरे संपर्क में हैं वो जानते है कि हमारे परिवार पर प्रभु की कितनी असीम कृपा हैं। पंडित श्री मेहता जी कहते है या आप सभी जानते हैं कि प्रभु की कृपा बरस रही है, बस आवश्यकता है तो हमें अपना मानसिक पात्र खोलने की है।
इसके साथ ही रोज सोचता हूँ कि छोटी पोस्ट लिखूंगा मगर बात शुरू करता हूँ तो जैसे रेगिस्तान में दौड़ना शुरू करो तो शायद पता नहीं चलता कि कितना दौड़ लिया और कहाँ आ गया, वैसे ही आजकल मेरे साथ हो रहा है। मेरी पिछली post "जीवन में सब सरल हैं, बस सरल होना कठिन है।"- post का शीर्षक 3 बार परिवर्तित किया था। क्योंकि कुछ निश्चित नहीं कर पा रहा था, वैसे ही आज सुबह से समझ नहीं आ रहा था कि क्या लिखूंगा और कैसे लिखूंगा, तभी एक मित्र के whatsapp में status "दान दिवस जयवंत हो" देखा तो देखने के बाद जैन धर्म में अक्षय तृतीया के महत्व पर जानकारी ली। मित्र माफी चाहूंगा जितनी जानकारी ली उतना उस पर लिख नहीं पाया। इसके साथ whatsapp पर एक जानकारी और हैं कि अक्षय तृतीया को हिन्दू धर्म में क्या-क्या हुआ था या होता है। उसमें से एक जानकारी बता रहा हूँ तो आप सभी को स्पष्ट कर पाऊंगा कि यहां किस जानकारी की बात कर रहा हूँ- उसमे एक जानकारी हैं कि आज ही के दिन मात्र अक्षय तृतीया को श्री बांकेबिहारी जी, वृन्दावन के चरणों के दर्शन होते है, बाकी सम्पूर्ण वर्ष प्रभु के पद ढके रहते हैं। मुझे ये दर्शन करने का सौभाग्य पिछले तीन साल पहले ईश्वर कृपा से प्राप्त हुआ था। इसको पढ़कर आपको याद आ गया होगा। मैं सोचता बहुत कुछ हूँ मगर आज की तरह बार बार परिवर्तित हो जाता हैं। शाम 7.45 तक यही सोच लिया था कि आज नहीं लिख पाऊंगा, कुछ शाला का कार्य था, एक T-con भी थी और आज अपने मित्रों को call करके feedback भी लिया, तो व्यस्तता कुछ ज्यादा रही। वैसे lockdown में ये कहना नहीं चाहिये क्योंकि अभी तो पर्याप्त समय हैं। कुछ ऐसे ही कार्य की वजह से निश्चित नहीं कर पा रहा था, फिर भी पेन, रजिस्टर लेकर लिखने बैठ गया और बिना शीर्षक के ही लिखना शुरू किया। ये पूरे post लिखने के बाद लगा आज के post को title "मन की बात" दे सकते है क्यूंकि अधिकांश मेरे मन की बात लिखी।
इसके साथ आज जो "दान दिवस" व whatsapp की जानकारी उसको और किसी पोस्ट में लिखने का प्रयास करूंगा। आज की पोस्ट, माफी चाहूंगा क्योंकि लिखते लिखते बीते हुए कल की हो गयी में जो धर्म को लेकर लिखा वो आप सभी जानते है, इसके अतिरिक्त और कुछ हो तो मुझे comments के द्वारा, जो मुझे व्यक्ति गत जानते है वो mobile पर भी दे सकते हैं, अगर वो blogger पर नहीं हैं तो। सबसे महत्वपूर्ण बात अगर इस post में दी गयी जानकारी में गलती हो तो मुझे क्षमा करें मगर आप feedback देकर सही जरूर करवाये। मैंने पूर्व में ही कहा है कि मैं अपने ज्ञान को धीरे-धीरे बढ़ा रहा हूँ।
आप सभी का स्नेह, समय व सहयोग मिलता रहें। इसी आशा व विश्वास के साथ आप सभी को सधन्यवाद व आप सभी के अंदर विराजमान उस परमात्मा के अंश को प्रणाम। इसके साथ ही प्रभु की कृपा से जैसे गूंगे बोलने लगते हैं, लंगडे पहाड़ों को पार कर लेते हैं, जिसे हमारे ग्रंथ में श्लोक से समझाया गया हैं, और इस श्लोक को पिछली post "अनकहे विचार जो कह ना पाए" में लिखा था, एक बार फिर जोड़ रहा हूँ कि
मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिम् यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम् ॥
भावार्थ- जिनकी कृपा से गूंगे बोलने लगते हैं, लंगड़े पहाड़ों को पार कर लेते हैं, उन परम आनंद स्वरुप श्रीमाधव की मैं वंदना करता हूँ॥
इसके साथ ही मैं ना कुछ लिख सकता हूँ, न मेरे पास ये सामर्थ्य हैं कि उस परमात्मा के विषय में लिख पाऊं, जो मैं लिख पा रहा हूँ सब उन्हीं की कृपा हैं। इसके साथ प्रभु से प्रार्थना है कि हे प्रभु इस महामारी से विश्व की रक्षा करें, साथ ही प्रार्थना आपके चरणों मे प्रस्तुत है-
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ॥
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः
अर्थ - "सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।"
परमात्मा को प्रणाम व आप सभी को नमन।
पिछली पोस्ट की link आप सभी नए साथियों के लिए-
https://jeevanekavsar.blogspot.com/2020/04/Jeevanmesabsaralhainsaralhonakathinhain.html?m=1
मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिम् यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम् ॥
भावार्थ- जिनकी कृपा से गूंगे बोलने लगते हैं, लंगड़े पहाड़ों को पार कर लेते हैं, उन परम आनंद स्वरुप श्रीमाधव की मैं वंदना करता हूँ॥
इसके साथ ही मैं ना कुछ लिख सकता हूँ, न मेरे पास ये सामर्थ्य हैं कि उस परमात्मा के विषय में लिख पाऊं, जो मैं लिख पा रहा हूँ सब उन्हीं की कृपा हैं। इसके साथ प्रभु से प्रार्थना है कि हे प्रभु इस महामारी से विश्व की रक्षा करें, साथ ही प्रार्थना आपके चरणों मे प्रस्तुत है-
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ॥
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः
अर्थ - "सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।"
परमात्मा को प्रणाम व आप सभी को नमन।
पिछली पोस्ट की link आप सभी नए साथियों के लिए-
https://jeevanekavsar.blogspot.com/2020/04/Jeevanmesabsaralhainsaralhonakathinhain.html?m=1



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