"जीवन में सब 'सरल' है, बस 'सरल' होना कठिन है"
परमपिता परमेश्वर को प्रणाम व स्नेहीजनों को सादर नमन। आप सभी के द्वारा post को पढ़ने व share करने में दिए जाने वाले समय व सुझाव हेतु में कृतज्ञ हूँ। कल दिनांक 26.04.2020 तिथि वैशाख शुक्ल तृतीया को श्री भगवान परशुराम प्राकट्योत्सव की आप सभी को अग्रिम हार्दिक शुभकामनाएं। प्रभु की कृपा हम पर सदैव ही रहती हैं, बस हम उसे महसूस करते रहें, यहीं ईश्वर से विनय हैं। इसके साथ ही हमे वो परमात्मा ऐसी सद्बुद्धि प्रदान करें जिससे हम अपने जीवन को हमेशा सत्कर्म में लगाए रखें। वैसे आप सभी जानते ही है कि
"जो इच्छा कर हो मन माही, प्रभु कृपा कछु दुर्लभ नाही।।"
हमारे मित्र महेश भाई को जन्मदिन कोटि कोटि शुभकामनाएं। ईश्वर से हम सभी की विनय है कि प्रभु उन्हें दीर्घायु व स्वस्थ रखें, क्योंकि कहा जाता है कि
पहला सुख निरोगी काया,
दूजा सुख घर में हो माया,
तीजा सुख कुलवंती नारी,
चौथा सुख पुत्र हो आज्ञाकारी,
पंचम सुख स्वदेश में वासा,
छठवा सुख राज हो पासा,
सातवां सुख संतोषी जीवन,
ऐसा हो तो धन्य हो जीवन।।
दूजा सुख घर में हो माया,
तीजा सुख कुलवंती नारी,
चौथा सुख पुत्र हो आज्ञाकारी,
पंचम सुख स्वदेश में वासा,
छठवा सुख राज हो पासा,
सातवां सुख संतोषी जीवन,
ऐसा हो तो धन्य हो जीवन।।
प्रभु हम सभी को ये सात सुख प्रदान करे।
मित्र महेश पटेल से मेरी मित्रता सन 1999 में कक्षा ग्यारहवीं से है और आप की शाला परिवार में सक्रिय सहभागिता हैं।
इसके आगे बात आपके समक्ष रखते हुए कि जैसा आज का शीर्षक है "जीवन में सब 'सरल' है, बस 'सरल' होना कठिन हैं" ये जो बात हमारे बीच घट रही हैं कि हम सरल है या नहीं हैं। उसके लिए आवश्यक हैं 'महत्व'। महत्व हमें सरल भी बना सकता है और कठिन भी। समाज मे सभी महत्वपूर्ण हैं जैसे इंसान, वस्तु, कार्य, व्यवहार आदि बहुत हैं जिनको महत्व देना हमारे लिए हितकारी भी है और कभी-कभी अहितकारी भी हो जाता है। मैं यहाँ व्यवहार से महत्व देने की बात करता हूँ, कि हमारे महत्व देने के तरीके से हम अपने जीवन को कठिन बनाते जाते हैं। सभी महत्वपूर्ण है मगर महत्वपूर्ण को लेकर हम किन-किन तरीकों से महत्व देते है, हो सकता है कि मेरा तरीका भी गलत हो या हमारे बीच में कुछ गलत तरीके से महत्व प्रदान किया जाता है। अधिकतर ऐसा होता है कि जो वर्तमान में, भविष्य में, सहयोग कर सके या दूसरे तरीके से जो हमे लाभ दे सकें उन्हें घर , परिवार, समाज में ज्यादा महत्व दिया जाता है। ऐसा उचित भी है एक दृष्टि से क्योंकि वो हर मामले में हमारी सहायता करने में समर्थ हैं। तो महत्वपूर्ण यह है कि हम बिना किसी स्वार्थ के सभी को महत्व दे और वो जिस व्यक्ति को महत्व दिया जा रहा है वो भी सुनिश्चित करें कि ये जो महत्व सच्चा हैं या लालच के लिए दिया जा रहा है और वो भी अगर समाज में निस्वार्थ भाव से हर किसी की मदद करे तो हम सबका जीवन सरल हो सकता है। मगर जब हम अपने ऊपर ये घटित करे कि मैं सामर्थ्यवान नहीं हूँ तो उस स्तिथि में मुझे महत्व ना दिया जाए तो मुझे कैसा महसूस होगा। हम शत-प्रतिशत सही नहीं कर सकते मगर हम अधिकतर तो सही कर सकते है। क्यूँ ना हम सबको समान सम्मान दे और कोई कार्य बोलकर न करे अपितु मैं अपने कार्य, रहन-सहन व बोलचाल से उसे हर जगह अपने जीवन मे लागू करूं। वैसे सभी सही बेहतर ही करते है मगर जीवन प्रयासों की यात्रा हैं। जिसमें हमें श्रेष्ठ से सर्वश्रेष्ठ की ओर जाना है। क्यूंकि उस परमात्मा का बनाया हुआ सब श्रेष्ठ हैं अब हम अपने मन, वचन व कर्म को एक करके अपना जीवन सरल कर सकते है। हमारी कठिनाई हम स्वयं हैं, हम स्वयं अपने जीवन को कठिन करने वाले हैं। अब बात आती हैं कैसे तो हमने मुखोटे लगा रखे हैं के हम जरूरत के हिसाब से व्यवहार करते है। बस मेरा मानना है ये कठिन कार्य हैं मगर हम ये कर पाए कि जैसे हम भीतर से हैं वैसे ही बाहर से होते जाए तो अपना जीवन सरल होने लगेगा और मन, वचन और कर्म भी धीरे-धीरे एक करे हम जो सोचे, वहीं बोले और वहीं कार्य करे एक रूपता के साथ तो हम सरल होने लगेंगे और हमारा जीवन भी सरल हो जाएगा। मेरे अनुभव से या बड़ों से सुनकर और उनके कार्यो को देखकर यही जाना तो आपके सम्मुख विचार प्रस्तुत हैं। आपका अगर और बेहतर अनुभव या नजरिया हो तो उसे भी बताए। आप सभी से स्नेह, सहयोग व सुझाव सदा मिलता रहे इसी आशा और विश्वास के साथ आपके अंदर विराजमान परमात्मा को प्रणाम।
सधन्यवाद इसके साथ श्री राजेश्वरवरानंद जी का एक वीडियो जो मैं share कर रहा हूँ जिसमे एक गुरु व शिष्य की कथा के द्वारा सरल पर बहुत ही प्यारे तरीके से बात रखी हैं। हो सकता है आपने वो video देखा हो तो एक बार और देख के दोहरा सकते है ना देखा हो तो देख कर अनुभव अवश्य बताये। आगे video की link add करता हूँ-
https://youtu.be/NQfMx1eNIBE
इसके साथ ही साथियों blog की setting में कुछ बदलाव तो उससे पुराने तीन post को ओपन करने पर कहीं इस तरह का संदेश आ रहा है तो blog delete नहीं हुआ है उसको rename किया है ।
मित्र महेश पटेल से मेरी मित्रता सन 1999 में कक्षा ग्यारहवीं से है और आप की शाला परिवार में सक्रिय सहभागिता हैं।
इसके आगे बात आपके समक्ष रखते हुए कि जैसा आज का शीर्षक है "जीवन में सब 'सरल' है, बस 'सरल' होना कठिन हैं" ये जो बात हमारे बीच घट रही हैं कि हम सरल है या नहीं हैं। उसके लिए आवश्यक हैं 'महत्व'। महत्व हमें सरल भी बना सकता है और कठिन भी। समाज मे सभी महत्वपूर्ण हैं जैसे इंसान, वस्तु, कार्य, व्यवहार आदि बहुत हैं जिनको महत्व देना हमारे लिए हितकारी भी है और कभी-कभी अहितकारी भी हो जाता है। मैं यहाँ व्यवहार से महत्व देने की बात करता हूँ, कि हमारे महत्व देने के तरीके से हम अपने जीवन को कठिन बनाते जाते हैं। सभी महत्वपूर्ण है मगर महत्वपूर्ण को लेकर हम किन-किन तरीकों से महत्व देते है, हो सकता है कि मेरा तरीका भी गलत हो या हमारे बीच में कुछ गलत तरीके से महत्व प्रदान किया जाता है। अधिकतर ऐसा होता है कि जो वर्तमान में, भविष्य में, सहयोग कर सके या दूसरे तरीके से जो हमे लाभ दे सकें उन्हें घर , परिवार, समाज में ज्यादा महत्व दिया जाता है। ऐसा उचित भी है एक दृष्टि से क्योंकि वो हर मामले में हमारी सहायता करने में समर्थ हैं। तो महत्वपूर्ण यह है कि हम बिना किसी स्वार्थ के सभी को महत्व दे और वो जिस व्यक्ति को महत्व दिया जा रहा है वो भी सुनिश्चित करें कि ये जो महत्व सच्चा हैं या लालच के लिए दिया जा रहा है और वो भी अगर समाज में निस्वार्थ भाव से हर किसी की मदद करे तो हम सबका जीवन सरल हो सकता है। मगर जब हम अपने ऊपर ये घटित करे कि मैं सामर्थ्यवान नहीं हूँ तो उस स्तिथि में मुझे महत्व ना दिया जाए तो मुझे कैसा महसूस होगा। हम शत-प्रतिशत सही नहीं कर सकते मगर हम अधिकतर तो सही कर सकते है। क्यूँ ना हम सबको समान सम्मान दे और कोई कार्य बोलकर न करे अपितु मैं अपने कार्य, रहन-सहन व बोलचाल से उसे हर जगह अपने जीवन मे लागू करूं। वैसे सभी सही बेहतर ही करते है मगर जीवन प्रयासों की यात्रा हैं। जिसमें हमें श्रेष्ठ से सर्वश्रेष्ठ की ओर जाना है। क्यूंकि उस परमात्मा का बनाया हुआ सब श्रेष्ठ हैं अब हम अपने मन, वचन व कर्म को एक करके अपना जीवन सरल कर सकते है। हमारी कठिनाई हम स्वयं हैं, हम स्वयं अपने जीवन को कठिन करने वाले हैं। अब बात आती हैं कैसे तो हमने मुखोटे लगा रखे हैं के हम जरूरत के हिसाब से व्यवहार करते है। बस मेरा मानना है ये कठिन कार्य हैं मगर हम ये कर पाए कि जैसे हम भीतर से हैं वैसे ही बाहर से होते जाए तो अपना जीवन सरल होने लगेगा और मन, वचन और कर्म भी धीरे-धीरे एक करे हम जो सोचे, वहीं बोले और वहीं कार्य करे एक रूपता के साथ तो हम सरल होने लगेंगे और हमारा जीवन भी सरल हो जाएगा। मेरे अनुभव से या बड़ों से सुनकर और उनके कार्यो को देखकर यही जाना तो आपके सम्मुख विचार प्रस्तुत हैं। आपका अगर और बेहतर अनुभव या नजरिया हो तो उसे भी बताए। आप सभी से स्नेह, सहयोग व सुझाव सदा मिलता रहे इसी आशा और विश्वास के साथ आपके अंदर विराजमान परमात्मा को प्रणाम।
सधन्यवाद इसके साथ श्री राजेश्वरवरानंद जी का एक वीडियो जो मैं share कर रहा हूँ जिसमे एक गुरु व शिष्य की कथा के द्वारा सरल पर बहुत ही प्यारे तरीके से बात रखी हैं। हो सकता है आपने वो video देखा हो तो एक बार और देख के दोहरा सकते है ना देखा हो तो देख कर अनुभव अवश्य बताये। आगे video की link add करता हूँ-
https://youtu.be/NQfMx1eNIBE
इसके साथ ही साथियों blog की setting में कुछ बदलाव तो उससे पुराने तीन post को ओपन करने पर कहीं इस तरह का संदेश आ रहा है तो blog delete नहीं हुआ है उसको rename किया है ।
यहाँ पर पिछले 3 post की link फिर से add कर रहा हूँ जो भी साथियों को link ना मिल पा रहा हैं तो तीनों post को यहां से पढ़कर, copy करके फॉरवर्ड कर सकते हैं। सधन्यवाद , बात रखने में कोई गलती हो तो क्षमा आप सभी के सुझाव हमेशा मुझे नया मार्ग दिखायेंगे, अतः आप अपना कीमती feedback जरूर दे। सभी को नमस्कार 🙏
बूँद बूँद से घड़ा भरता है
अनकहे विचार जो कह ना पाए
वैश्विक व्याधि




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