जहाँ चाह वहाँ राह(विद्यालय अनुभव 01)

           "जहाँ चाह वहाँ राह"

             "ईश्वर को प्रणाम आप सभी साथियों को नमन 🙏🏻"
 आप सभी से समय, स्नेह, सहयोग व सुझाव प्राप्त हो रहे हैं, साथ ही whats app group पर भी आप सभी से सराहना प्राप्त हो रही है।

                 आज की बात शुरू करने से पहले हमारे मित्र दृश्य व द्रव्य शुक्ला को जन्मदिन की कोटि कोटि हार्दिक शुभकामनाएं, भगवान से प्रार्थना है कि प्रभु आप दोनों भाइयों को स्वस्थ व दीर्घायु रखें, साथ ही आपके सकल मनोरथ पूर्ण करें। साथ ही दिनांक 25.04.2020 की post "जीवन में सब सरल है, बस सरल होना कठिन है" में सात सुखों की बात की थी। ईश्वर से प्रार्थना है कि वह सात सुख आपको प्रदान करें। साथ ही भगवान की कृपा से हम सभी इस वैश्विक व्याधि में घर पर रहते हुए स्वस्थ व निरोगी रहें।

                जैसा कि आज का शीर्षक है, "जहाँ चाह वहाँ राह, में आज इस पोस्ट के माध्यम से बात रखूंगा कि जीवन में जब पीछे जा कर देखता हूं, तो पाता हूं कि मेरी जो चाह (इच्छा)है, वर्तमान समय में उसकी राह कितने पहले ही ईश्वर ने निर्मित कर दी थी। इस राह की एक कड़ी पर आज बात कर रहा हूं। भगवान ने मुझे यह सुविचार व  सुअवसर प्रदान किया, उसके लिए मैं प्रभु का कृतज्ञ हूं। बात कुछ इस तरह है कि इस पूरे घटनाक्रम में एकमात्र जरिया हूँ, सिर्फ परमेश्वर की कृपा को देखने की कोशिश कर रहा हूँ। सिर्फ बताने का प्रयास है कि अगर जीवन में सही लोगों का साथ है, तो हम बहुत कुछ भले ना कर पाए मगर कुछ ना कुछ अच्छा जरूर कर पाते हैं। जीवन में सभी मित्रों की उपस्थिति व आप सभी का सम्मान एक समान ही है। आप सभी की वजह से ही मैं यह बात रख पा रहा हूँ। आज विद्यालय की चर्चा से "जहाँ चाह वहाँ राह" कैसे मिल जाती है। उसको अपने जीवन की घटना से जोड़ कर देख पा रहा हूं।
               दोनों मित्रों का साथ माह अप्रैल 2007 में पहली बार प्राप्त हुआ था। आप दोनों मेरे सीधे मित्र नहीं थे, उस समय मेरे मित्र अभिषेक शुक्ला थे और आज भी मित्रता व प्रेम उसी तरह बना हुआ है। आप दोनों अभिषेक शुक्ला के  चाचा जी के सुपुत्र हैं। अभिषेक शुक्ला से मेरा परिचय पीजीडीसीए पाठ्यक्रम 2007 माह जुलाई में पहली मुलाकात हुई थी। मित्रता के मामले में ज्यादा बड़े बोल तो नहीं बोल रहा जैसा कि आप सभी जानते ही हैं कि श्री लक्ष्मण जी का दूसरा नाम सौमित्र है। मेरा भी यही नाम हैं, तो कई बार शुरुआत की मुलाकात में नए मित्र पूछ लेते हैं कि क्या आप के सौमित्र हैं, तो मैं कहता हूँ कि मित्रों के मामले में बड़ा सौभाग्यशाली हूँ। 
              ऐसा नहीं है कि मनमुटाव हम मित्रों के बीच ना आया हो मगर भगवान की कृपा से शीघ्र ही रिश्ते सामान्य हो गए। रिश्तों को लेकर मुनि श्री तरुण सागर जी महाराज की यह बात हमेशा उपयोग करना चाहिए, क्योंकि याद तो हमें बहुत कुछ रहता है बस उपयोग करना भूल जाते हैं। बात यह है कि -

              "भले ही लड़ लेना, झगड़ लेना, पिट जाना, पीट देना, मगर बोलचाल बंद मत करना क्योंकि बोलचाल बंद होते ही सुलह के सारे दरवाजे बंद हो जाते हैं।"

              तो मुख्य बात पर वापिसआते हुए अप्रैल 2007 के बाद इन से मुलाकात अक्टूबर 2007 में हुई। जब मैं कार्य ढूंढने व करने के उद्देश्य से अचानक इंदौर गया। वहां जाकर जानकारी प्राप्त हुई कि दोनों भाई भी एमबीए की पढ़ाई करने इंदौर ही में हैं। फिर धीरे-धीरे मित्रता बढ़ती गई।
              2007 से जुलाई 2013 के बीच की चर्चा और किसी पोस्ट में करूंगा। अब सीधे जुलाई 2013 में आते हैं। जुलाई 2013 में शिक्षा विभाग में कार्य करने का सुअवसर प्राप्त हुआ। सौभाग्य से मेरी  नियुक्ति ग्राम शासकीय प्राथमिक शाला,औरिया, वर्तमान में नाम शासकीय एकीकृत माध्यमिक शाला, औरिया, जैसीनगर, सागर, मध्य प्रदेश में हुई और आज वर्तमान में भी वहीं पर प्राथमिक शिक्षक के रूप में  कार्य कर रहा हूँ। जुलाई 2013 से सत्रांत तक कक्षा पांचवी को पढ़ाया। पूरे वर्ष में नये अनुभव के साथ कुछ प्रसन्नता व कुछ परेशानी भी महसूस हुई। क्योंकि यह कार्य मेरे लिए बिल्कुल नया था,इसके पूर्व कभी भी मैंने इस शिक्षा के क्षेत्र में पढ़ाई के अलावा कार्य का कोई अनुभव नहीं था।
   
                     विभाग में कार्य करने के पहले वर्ष में शाला परिवार,ग्रामीण सहयोग व विभागीय अधिकारियों ने सभी ने मेरे मार्ग में आने वाली समस्याओं को हल करने का उचित तरीका बताया। साथ ही मेरे कार्य को सभी ने बहुत सराहा।
              नए सत्र की शुरुआत के पूर्व में मैंने जो पिछले सत्र में अनुभव किया था कि कुछ विद्यार्थियों के पास आवश्यक पाठ्य सामग्री की कमी है।  उस अनुभव से मन में जो विचार उत्पन्न हुए कि एक तो इन परिवार पर दबाव दिया जाए या दूसरा अपने स्तर पर हल ढूंढा जाए।  एक वाक्य मैंने पढ़ा था, वह आज मेरी दृष्टि में सफलता का सूत्र बन गया-

                        "It is better to light a candle than curse the darkness."

हिंदी में -

                  "अंधेरे को कोसने से बेहतर है कि खुद ही एक दीपक जलाये।"        

             साथ ही हिंदी में इसलिए लिख रहा हूं कि पढ़ा english में था और अनुवाद करके उपयोग हिंदी भाषा में किया।इसको हमारे विद्यालय की दीवाल पर भी शाला परिवार द्वारा लिखवाया गया है।
             मित्र द्रव्य शुक्ला से सत्र जुलाई 2013 से मार्च 2014 तक के अनुभव की चर्चा की। तो पिछले सत्र में सामग्री की समस्या से कुछ विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित हुई थी। तो बच्चों के भाग्य से मित्र ने सहयोग की सहमति दी। उस सत्र जुलाई 2014-2015 में कक्षा 1 के समस्त विद्यार्थियों को सहयोग से एक समान आवश्यक पाठ्य सामग्री प्रदान की गई।
            उसके बाद विद्यार्थियों की किस्मत से, भगवान की कृपा से, सकारात्मक सोच ने कैसे धीरे-धीरे विस्तार लिया। उसकी चर्चा में आगे की पोस्ट में आपसे सांझा करूँगा।
             एक बात और जब भी मैं शाला परिवार कह रहा हूं, तो ऐसा नहीं है कि जो शिक्षक उस संस्था में पदस्थ हैं। मात्र उनके कार्य कि बात कर रहा हूं। शाला परिवार में वह सभी शामिल हैं, जो शाला के विद्यार्थियों के लिए प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से मदद कर रहे हैं। इस कार्य में मुझे औरिया ग्राम से दूर गांव के ही किसी व्यक्ति के रिश्तेदार भी ईश्वर से प्रार्थना कर रहे है कि हम सभी सफल हो। तो वे भी शाला परिवार के ही सदस्य हैं। जो सीधे परिचित हैं वह भी परिवार हैं। इसके अतिरिक्त आज की इस इंटरनेट की दुनिया में कोई पोस्ट पढ़ कर, हमारे विद्यालय के विषय में सोच रहा है तो वे भी शाला परिवार के ही सदस्य हैं। हम सभी "वसुधैव कुटुंबकम" को मानने वाले हैं।
               साथियों इस चर्चा को मैंने इसलिए रखा कि कुछ चाह हो तो भगवान राह भी बनाता है और कितने पूर्व से बनाता है। इस घटना के माध्यम से मैंने बताने का प्रयास किया है। यह एक मात्र घटना नहीं है, मेरे जीवन में जब मैं आस पास देखता हूं तो ऐसे कई साथियों का साथ है, जिनकी उपस्थिति से मुझे रिश्तो का महत्व, सकारात्मक विचार, समस्या का समय के साथ स्वतः ही समाधान हो जाना। मेरे जीवन में प्रत्येक प्रत्यक्ष परिचित व अप्रत्यक्ष अपरिचित सभी व्यक्तियों का कोटि-कोटि धन्यवाद।
             उक्त लिखित बातों में जहां चाह वहां राह को अपने जीवन से जोड़कर समझने का प्रयास किया हैं। इसके साथ ही यह विनय है कि हम अपने आसपास परिवार में, समाज में, राज्य में, देश में या संपूर्ण विश्व में समस्या को अपने स्तर पर भी उसे हल करने की कोशिश करें, तो हमें हल अवश्य मिलता है। जब कभी विचार करता हूँ या जब कुछ समझ नहीं आता या ऐसा प्रतीत होता है कि मंजिल मिलेगी या नहीं निकल तो गया हूं, तो निम्नलिखित पंक्तियां बड़ा सुकून देती हैं-
            मंजिल मिल ही जाएगी एक दिन, भटकते-भटकते ही सही,
             गुमराह तो वो है जो घर से निकले ही नहीं।
             खुशियां मिल जाएगी एक दिन, रोते रोते ही सही,
             कमजोर दिल के वो हैं, जो हंसने की सोचते ही नहीं ।।
             पूरे होंगे वो हर ख्वाब, जो देखे हैं अंधेरी रातों में,
             नासमझ है वो, जो डर से पूरी रात सोते ही नहीं।
             मंजिल मिल ही जाएगी एक दिन, भटकते भटकते ही सही,
             गुमराह तो वो है जो घर से निकले ही नहीं।।

               आप सभी को धन्यवाद, आशा व विश्वास है कि आप सभी अपनी दुआओं में मुझे याद रखेंगे। आप अपना फीडबैक कमेंट बॉक्स से या परिचित मित्र व्हाट्सएप के द्वारा जरूर दें।
                           ईश्वर को प्रणाम आप सभी को नमन
                                          
                  पिछली पोस्ट पर जाने हेतु लिंक-
                  https://jeevanekavsar.blogspot.com/2020/04/Shabdonkamahatv.html?m=1

Comments

Sunil Shukla said…
Very nicely expressed.
Sumitra pandey said…
सौमित्र सच की राह पर परिणाम देर से सही मगर श्रेष्ठ होते हैं,और इस पर चलने से जो चिन्ह बनते है वे पीछे आने वालों के लिए सुगमता प्रदान करते हैं, इसलिए बढ़े चलो ।
जी आपका आशीर्वाद और प्रेरणा के लिए धन्यवाद।
Shiva goutam said…
Bahut shandar ab pichhe na mudna aage badte rahna
जी धन्यवाद
आपकी शुभकामनाओं का असर होगा 🙏🏻
dj said…
सराहनीय प्रयास की शुरुआत कैसे हुई जानने की काफी उत्सुकता थी। आपकी पोस्ट से जानकर अच्छा लगा स्वार्थपरता और साम्प्रदायिक द्वेष भाव वाले इस कठिन समय मे और भी लोग हैं जो दूसरों के लिए कुछ करने और उनका जीवन सवारने की चाह रखते हैं आपको और इस कार्य मे लगे आपके विद्यालय कुटुम्ब के सभी साथियों को कोटि कोटि प्रणाम और अनंत शुभकामनाएं��
dj said…
सराहनीय प्रयास की शुरुआत कैसे हुई जानने की काफी उत्सुकता थी। आपकी पोस्ट से जानकर अच्छा लगा स्वार्थपरता और साम्प्रदायिक द्वेष भाव वाले इस कठिन समय मे और भी लोग हैं जो दूसरों के लिए कुछ करने और उनका जीवन सवारने की चाह रखते हैं आपको और इस कार्य मे लगे आपके विद्यालय कुटुम्ब के सभी साथियों को कोटि कोटि प्रणाम और अनंत शुभकामनाएं��
आपका आभार, कि आपने कार्य को जानने में जो उत्सुकता हेतु समय दिया। जो भाव हैं, उसी भाव से सभी कार्य कर रहे हैं,ऐसी शुभकामनाओं हेतु आपका आभार और आप भी मुझे मदद करती ही हैं,तो आप भी विद्यालय कुटुंब में सम्मिलित है।आप को कोटि-कोटि नमन 🙏🏻
Sandhya sahu said…
में आप की एक बात से बहुत प्रभावित हुई हूं कि आप ने लिखा है कि गुमराह तो वो है जो घर से निकले ही नहीं सही बात है जब हम कोशिश ही नहीं करेंगे तो मंजिल खा से मिलेगी बहुत बढ़िया प्रयास आप का अपनी कर्मभूमि के लिए अनंत शुभकामनाएं आप को
आपका कोटि कोटि आभार
मैंने तो इस पोस्ट में उन पंक्तियों को जोड़ा हैं, मूलतः लेखक कोई और हैं, internet पर जानकारी भी नही हैं, वो किनकी द्वारा रचित हैं। आप और मैं उन्हें धन्यवाद देता हूँ, जिनने वो पंक्तियों को लिखा है।🙏🏻
Badal Chourasia said…
Very well said bhai awesome
Thansks dear,
All of you are the influence of your friends' prayers, you are also the effect of all your help.
धन्यवाद आदरणीय बड़े भाईसाब🙏🏻
VK Goutam said…
This comment has been removed by the author.
VK Goutam said…
My Respected elder brother,

You are doing the great social work.
The way you have dedicated your life to children's for improve their education level with better facility (like Digital classes) and beautiful environment ( like Ply ground, inspirational quote, attractive message through painting) that makes a lot of improvement in their basic education level.
Dear vidhyakant,

These are not the results of my efforts alone,Are the result of all your cooperation.thanks my younger brother